Khushi dedna our Lena aasan hai

 दो जरूरत मंद जब आपस मे ताअल्लुक़ बनाते है तो शुरू शुरू में बहुत खुश होते है ,, क्यों कि दोनों दिल ही दिल में सोच रहे होते है के ये वही है जिसका में आज तक इंतिज़ार (करती या) करता आया हूँ

ये वही खास है जो मेरी जिंदगी को खुशियों से भर देगा

गमों से नजात दिलाएगा

मेरे ज़ख्म भर देगा.. 

माजी को मरहम लगाएगा.. 

मेरे लिए तारे तोड़ के लाएगा...

में रोऊं तो मुझे हंसाएगा...

में रुठुं तो मुझे मनाएगा...

मरते दम तक मेरा साथ निभाएगा...

क्योंकि मेरी तमाम जरूरतें जिन्हें मैने ख्वाइशों का नाम दे रखा है को पूरा करेगा

दोनों को ये नही पता होता के अंदर से हम दोनों ही जरूरतमंद है ,, यानी सिर्फ लेने वाले है, देने वाले नही 

जब ताअल्लुक़ का "नया पन" खत्म होता है तो एक दूसरे से बांधी उम्मीद भी मरने लगती है 

दोनों ये सोचते है के ये वह नही है, जिसे मैने समझा था के मेरी जरूरतें पूरी करेगा 

दोनों को दर्द होने लगता है 

दोनों एक दूसरे से दूर होने लगते है 

फौरन मैसेज का जवाब देने वाले एक दूसरे को कई कई दिन जवाब नही देते 

दोनों के दरमियान कॉल कम हो जाते है

ब्लेम गेम शुरू हो जाती है 

तुम ये हो...

तुम वह हो...

तुम ऐसे हो...

तुम वैसे हो...

ये क्या है ? 

वह क्या है ? 

तुम ये नही करते...

तुम वह नही करते..

लाशऊर कि लड़ाई शऊरी तौर पर होने लगती है

यहां तक के बात ब्रेकअप तक पहुंच जाती है

जो हाथ में हो उसे छोड़ने से पहले किसी नए की तलाश शुरू हो जाती है

एक जरूरतमंद दूसरे जरूरतमंद को छोड़कर कुछ "नया ढूंढने के लिए निकल खड़ा होता है

नए के साथ जब "नया पन" खत्म होता है तो पता चलता है के ये भी जरूरतमंद है


कहानी खुद को बार बार दोहराती है ,, और किरदार को समझ नही आती के कहानी तब खत्म होगी ज़िंदगी खुशियों से , मोहब्बत से तब भरेगी जब ये समझ आएगी के लेने वालों को देने वाले कम ही मिलती है मगर देने वालों पर दुनिया टूट पड़ती है ✍🏻 AbdulAziz salafi

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