*मेरे प्यारे देश वाशियों*

रमज़ान के महीने का शुभ आरम्भ है। इस महीने के विशेष नियम हैं। इस में दिन भर संयम का अभ्यास करने के नियम है। इसमें सूर्योदय के एक घंटे पूर्व से लेकर सूर्यास्त तक भूखे-प्यासे रहकर हमें समाज के गरीब वर्ग के लोगों की भूख प्यास दुख तक्लीफ का अहसास होता है, और इंसान ईश्वर के समक्ष सभी प्रकार की बुराइयों से आत्म-समर्पण करता है ।


आनंद की खोज में पारिवारिक व सामाजिक ज़िम्मेदारियों से भागने का अपराधी इंसान भी 'त्यागी' बन जाता है, पर निंदा, गालम गलोच, कुतर्क, असभ्य भाषा, नाम बिगाड़ना, जैसे अन्य कुकृत्यों में भी कई लोगों को आनंद आता है , यह पवित्र माह ऐसे लोगों के लिए विशेष अवसर होता है कि वो स्वयं को इस समस्त बुराइयों से स्वतंत्र कर लें ।


मनुष्य स्वार्थी और लालची होता है इसलिए समाज में ब्याज और रिश्वतखोरी जैसी बुराई आम सी बात है , इसलिए इस्लाम ने रिश्वतखोरी को महापाप कहा तो ब्याज को निसेध और वर्जित ठहराया और यह शिक्षा दी कि ब्याज लेने वाला ईश्वर से जंग का ऐलान करता है , इन सभी बुराइयों से छुटकारे के लिए ज़कात यानि एक विशेष प्रकार के दान को अति अनिवार्य किया , यह एक वार्शिक दान है जिसमें मालदार अपने माल से ढाई परसेंट के हिसाब से माल निकाल कर समाज के गरीब लोगों पर खर्च करता है ।


रोज़े में उन सब आदतों पर नियंत्रण का अभ्यास कराया जाता है । आदि काल से हर मानव समूह में रोज़े अनिवार्य रहे हैं । एक निश्चित मास, 'रमज़ान के महीने' में रोज़ों का आदेश दे कर, प्रशिक्षण में उत्सव का रंग भर दिया गया है। जिससे न केवल यह कठिन अभ्यास परस्पर सहयोग से सरल हो जाता है, बल्कि समाज में सद्गुणों की बयार सी चलने लगती है ।


मुस्लिमों से आग्रह है कि रोज़े का पूर्ण रूपेण पालन करें। रोज़े में भूख-प्यास ही नहीं, कई इच्छाओं पर नियंत्रण का आदेश है । गैर मुस्लिम बहन भाईयों से भी अनुरोध है कि वे भी यह गरिमापूर्ण प्रशिक्षण जितना ग्रहण कर लाभ उठा सकते हों अवश्य करें।


*इस्लाम या रमज़ान से सम्बंधित किसी प्रकार की जानकारी के लिए आप हमें व्हाट्स पर या टैक्स्ट मैसेज कर सकते है ।।*

*अब्दुल Aziz salafi*


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